खुद को ही ख़र्च कर देती है औरत: नारी त्याग और संघर्ष की अनकही सच्चाई

औरत

एक ऐसा शब्द, जिसमें त्याग, प्रेम और समर्पण छुपा होता है। समाज में औरत को कई रूपों में देखा जाता है—माँ, बेटी, पत्नी, बहन। लेकिन इन सभी रिश्तों को निभाते-निभाते वह अक्सर खुद को भूल जाती है। सच तो यह है कि औरत खुद को ही खर्च कर देती है अपनों के लिए।
अपनों के लिए खुद को पीछे रखना
औरत अपने सपनों को कभी बच्चों के भविष्य के लिए, तो कभी परिवार की ज़रूरतों के लिए पीछे रख देती है।
वह अपनी थकान को मुस्कान के पीछे छुपा लेती है और अपनी इच्छाओं को “बाद में” के लिए टाल देती है।
उसे शिकायत करना नहीं आता,
क्योंकि उसने प्यार करना सीखा है।


अपनों के लिए खुद को पीछे रखना
औरत अपने सपनों को कभी बच्चों के भविष्य के लिए, तो कभी परिवार की ज़रूरतों के लिए पीछे रख देती है।
वह अपनी थकान को मुस्कान के पीछे छुपा लेती है और अपनी इच्छाओं को “बाद में” के लिए टाल देती है।
उसे शिकायत करना नहीं आता,
क्योंकि उसने प्यार करना सीखा है।


औरत का त्याग: जो दिखता नहीं
समाज अक्सर औरत के त्याग को उसकी ज़िम्मेदारी मान लेता है।
उसके दर्द को सामान्य समझ लिया जाता है और उसकी चुप्पी को उसकी सहमति।
जो हर किसी का ख्याल रखती है,
उससे शायद ही कोई पूछता है—
“तुम ठीक हो?”

जो सबका ख्याल रखती है, क्या उसका ख्याल कोई रखता है?

वह सुबह सबसे पहले उठती है और रात में सबसे आख़िर में सोती है।
सबका ध्यान रखती है, पर जब बात खुद की आती है—
वह चुप रह जाती है।
यही है एक औरत की सबसे बड़ी सच्चाई।
सम्मान सिर्फ शब्दों से नहीं
औरत को सम्मान सिर्फ भाषणों या पोस्टर से नहीं चाहिए,
बल्कि उसके भाव, उसके फैसलों और उसके सपनों को समझने से चाहिए।
उसे भी हक़ है—
अपने सपने जीने का
अपनी पहचान बनाने का
और खुद के लिए जीने का


निष्कर्ष
औरत कमजोर नहीं होती
वह बस अपनी ताकत को शोर में बदलना नहीं चाहती।
अब समय है कि
हम उस औरत का भी ख्याल रखें,
जो सबका ख्याल रखते-रखते
खुद को भूल गई।

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